श्रमण श्री विभंजनसागर जी मुनिराज के मंगल प्रवचन 23-01-2018 दिन- मंगलवार
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गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषो पर जावे......🖋
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन अटा मन्दिर, ललितपुर (उ. प्र.) में श्रमण श्री विभंजनसागर जी मुनिराज ने आज मेरी भावना की व्याख्या करते हुए बताया कि श्रावक को चार भाव बताते हुए पं. जुगल किशोर मुक्तार जी ने कहा कि सभी जीवों से मैत्री भाव रखना, जो गुणवान लोग है उनको देखकर प्रमुदित भाव रखना, जो दुःखी लोग है उन पर करुणा का भाव रखना और जो विपरीत बूढी बाले है, विपरीत क्रिया, चर्या वाले है उन से माध्यस्थ भाव रखना ये चार भाव हर श्रावक को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
मुनिश्री ने आगे की मेरी भावना की व्याख्या करते हुए बताया- 'होऊ नहीं कृतघ्न कभी में ,द्रोह न मेरे उर आवे; गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषो पर जावे।।' यहाँ पर कवि कहना चाहता है कि यदि जीवन में कभी किसी ने आप पर उपकार किया है तो उस उपकारी के उपकार को भुला मत देना। क्योकि उस व्यक्ति ने उस समय आप पर उपकार किया था जब आपको बहुत जरूरत थी। उसके उपकार को कभी भुलाया नहीं जा सकता ,उसके बाद आप भले ही कितने बड़े व्यक्ति बन जाये, पैसे वाले बन जाये ,बहुत सम्पन्नता आ जाये लेकिन फिर भी उस व्यक्ति के उपकार को कभी मत भुला देना क्योकि उस समय का जो उसका उपकार था वह बहुत बड़ा था। कभी कृतघ्न नहीं हो जाना और द्रोह न मेरे उर आवे अर्थात अपने हृदय में उसके प्रति कभी द्रोह भाव नहीं लाना, कभी रॉसपना नहीं लाना ,कभी उसको नीचा दिखाने का प्रयाश नहीं करना।
मुनिश्री ने बताया आचार्यो ने कहा है- 'नहीं कृत मुपकारा ,साधवा विश्मरंती' अच्छे बुरे उस उपकार को नहीं भूलते ,उपकार का बदला उपकार से दिया। जो महान पुरुष होते है, महा पुरुष होते है वह उपकार को स्मरण करते है -जैसे बालक पारस कुमार ने नाग -नागिन पर उपकार किया तो वह नाग- नागिन ने भी पार्श्व मुनि के उपसर्ग को दूर करने के लिए धरणेन्द्र -पद्मबति बन कर आ गये थे। जो उपकारी के उपकार को मानता है उसे कृतज्ञ कहते है और उपकारी के उपकार को नहीं मानना, अपकार करना द्रोह कहलाता है। हमारे जीवन में माता- पिता ने हम पर उपकार किया, हमारे अध्यापक ने उपकार किया, कोई शिक्षक ने उपकार किया, कोई व्यापार सिखाने बाले ने उपकार किया, किसी ने भोजन कराया, किसी ने कोई काम किया ,कुछ भी उपकार किया हो उसके उपकार को कभी भुलाना नहीं चाहिए।इसी प्रकार गुरु ने भी हमें संसार मार्ग से निकालकर मोक्ष मार्ग में लगाया उनका भी हम पर बहुत बड़ा उपकार है उस उपकार को कभी भूलना नहीं चाहिए।
मुनिश्री ने बताया 'तत्वार्थ सूत्र' में एक सूत्र है- 'परस्परोपग्रहो जीवनां' जिसका अर्थ है परस्पर में उपकार करना जीव का लक्षण है इसलिए सभी को आपस में एक दूसरे पर उपकार करते रहना चाहिए। जैसे की आपने कहानी सुनी होगी एक लकड़हारे ने एक शेर पर उसका काँटा निकाल कर उपकार किया था तो उस शेर ने भी उस उपकार का बदला उपकार करके दिया ,वह शेर भी उस लकड़हारे की बहुत मदद करने लगा था लेकिन उस लकड़हारे ने उस शेर को गीदड़ कहकर अपमानित किया था।
मुनिश्री ने बताया आगे की पंक्ति कहती है- 'गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषो पर जावे' अर्थात किसी गुणवान व्यक्ति के पास जाये तो उसको देखकर ,उसके गुणों को ग्रहण करने की कोशिश करे न की उसके दोषो को देखे क्योकि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसके पास गुण ही गुण हो ,या ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसके पास दोष ही दोष हो। यदि संसार में है तो गुण और दोष दोनों चीजे उसके पास होगी। हम गुणों को ग्रहण करे दोषो को न देखे जैसे कोयल दिखने में काली लगती है लेकिन बोलती बहुत मधुर है ।हम कोयल का कालापन न देखे हम कोयल का मीठा बोलना देखे। आचार्य जिनशेन स्वामी ने महापुराण ग्रन्थ में लिखा है हंश बनो जोंक नहीं ,इसका तातपर्य हंश जो होता है बो नीर में से भी क्षीर को ग्रहण करता है और नीर-नीर को छोड़ देता है। अर्थात जो प्राणी हंश की तरह दृष्टि रखते है वे सारभूत बातो को जीवन में ग्रहण करते जाते है तथा असार की बातों को छोड़ते जाते है ।जबकि जोंक होता है वह गाय के स्तन से भी दूध को नहीं अपितु खून को चूसती है। इसी प्रकार जो दोषग्राही होता है वह अच्छाई को नहीं देखता ,अवगुणों और दोषो पर ही दृष्टि होती है।
मुनिश्री ने बताया -' चंदन पड़े चमार घर ,निश दिन कुटे चाम ;चंदन वेचारा क्या करे, पड़े नीच के दाम' अर्थात चन्दन की लकड़ी यदि किसी जुटे बनाने बाले के हाँथ में आ जाये तो उसमें उसका क्या होगा? वह चंदन चमड़ा कूटने के काम ही आएगी। वह नहीं समझेगा की यह पूजन में चंदन बनाने के काम आवेगी। वैसी ही दशा इस राज्य के लोगो की है कि लोग गुणों को नहीं दोषो को देखते है कमियां निकालते है ,आप कहीँ भी चले जाये हर जगह ऐसे ही लोग मिलेंगे जो आपके अवगुण को देखेंगे। बहुत विरले ही लोग होते है जो दोषी व्यक्ति के अन्दर भी गुण देख लेते है। इसलिए गुणों को देखे ,हंश बने गिध्य न बने हंश की तरह क्षीर- क्षीर को पी ले अर्थात सारभूत को ग्रहण करे परन्तु गिध्य की तरह कुत्षित दृष्टि कभी भी न रखे।🍂🍂
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